खरमास के बारे में ये रहस्य जानकर चौंक जाएंगे आप- खरमास में ये काम भूलकर भी न करें:-हिंदू पंचांग के अनुसार, 16 दिसंबर को सूर्य की धनु संक्रांति पड़ रही है, यानी सूर्यदिव वृश्चिक से धनु राशि में प्रवेश करेंगे. यहां वे एक मास तक रहेंगे, क्योंकि सूर्य एक राशि पर एक मास गोचर करते हैं.
- इसे खरमास कहते है. ऐसा तब होता है, जब सूर्य देवताओं के गुरु बृहस्पति की राशि मीन या फिर धनु में गोचर करते हैं. इस दौरान देवगुरु की स्थिति काफी कमजोर हो जाती है, जिससे विवाह से लेकर अन्य मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है.
आया खरमास शुभत्व का हुआ हास
ज्योतिष शास्त्र में राशियां स्त्री मान्य हैं और उनके स्वामी ग्रहगण होते हैं. इस क्रम में सिंह के सूर्य, कर्क के चंद्रमा, मेष और वृश्चिक के मंगल, मिथुन और कन्या के बुध, धनु और मीन के बृहस्पति, जूप और तुला के शुक तथा मकर और कुंभ के स्वामी शनि होते हैं. राहु और केतु अशरीरी होकर छाया सह है, अतः वे किसी राशि के स्वामी नहीं हैं.
खरमास, दरअस्सल ज्योतिष का एक प्रसिद्ध योग है,
जिसे ‘गुर्वादित्य’ कहते हैं. या दो शब्दों की संधि से बना है- गुरु और आविाय यह तब पड़ता है, जब सूर्य गुरु की राशि घर में वा गुरु सूर्य की राशि पर गोचर करें. ऐसे में यह वर्ष में दो बार एक एक महीने के लिए और बारह वर्ष में एक बार एक वर्ष के लिए पड़ता है. चूंकि गुरु का स्वामित्व धनु और मीन पर है तथा सूर्व एक राशि पर एक मास राहते हैं, अतः प्रति वर्ष का दो मास चलता है. एक-एक महीने का होने के कारण इसे खरमास कहते हैं.
चूंकि बृहस्पति एक राशि पर 12/13 महीने राहते हैं और पूरे राशि चक्र का परिक्रमण 12 वर्ष में कर पाते हैं, अतः इनसे कारित योग बारह वर्ष बाद आता है. जब बृहस्पति सूर्य के स्वामित्व वाली सिंह राशि पर बारह महीने के लिए आ जायें, इसे सिंहस्थ’ भी कहते है.
इन कालखंडों में शुभत्व का हास हो जाता है,
अतः मांगलिक कार्यों, जैसे विवाह, मुंडन, नव कावरिंभ आदि वर्जित हैं. दरअसल, सूर्य अग्नि तत्व प्रधान और पापला है तथा गुरु सौम्य प्रकृति, सरल, परम शुभ हैं, अतः एक-दूसरे के घर में होने पर कसित प्रभाव हो जाते हैं.
यी कहिये कि
ऐसी दशा में उनके अंतरिक्षीय विकिरण (कास्मिक राडियेशंस) पृथ्वी पर कमतर आते हैं और कम शुभत्व दे पाते हैं, जबकि मांगलिक कार्यों के लिए उत्तम शुभत्व जरूरी है, अतः विज्ञजनों ने इन समयावधियों में शुभ कार्यों के संपादन की वर्जना की है.
ऐस्य होते हुए भी आवश्यक वस्तुओं की खरीद, दान, धर्म, पूजा-पाठ की सामग्री क्रय की जा सकती है, साथ ही चूंकि एक मास वाला कालखंड बिना शुभ कार्य किये पार किया जा सकता है, किंतु सिंहस्थ वाला काल पार करना कठिन है. अतः पंडित जनों ने इसका एक तोड़ निकाला है,
मान्यता है कि
गुर्वादित्य कु-योग का प्रभाव गंगा और गोदावरी के बीच के भू-भाग पर ही विशेष होता है, अतः इसके बाहर शुभ कार्य संपन्न किये जा सकते हैं. प्रयागराज का प्रहाद पाट इसके लिए उपयोगी रहता है. एक बात और, यह वर्जना मांगलिक कार्यों के लिए ही है. खरमास के कालखंडों में जन्म लेने
बाले जातक अच्छाइयों से युक्त भी होते है.
उदाहरण के लिए आसन्न खरमास में जन्म लेने वाला जातक परिजनों पर कोप करने वाला तो होगा, किं यह बुद्धिमान, धनवान, साधुओं की आदर देने वाला, अपनी सुबुद्धि से लोगों की बुद्धि और संतोष की वृद्धि करने वाला भी होगा, भा
सिंहस्थ में होगा नासिक कुंभ का आयोजन
सिंहत्य में कुंभ जैसा शुभ आयोजन गोदावरी तट पर नासिक में होता – है. चूंकि गुरु 31 अक्तूबर, 2026 को सिंह में चले जायेंगे, अतः इसी दिन से मेला शुरू होगा, जो 24 जुलाई, 2028 तक करीब 21 महीने चलेगा. इसमें तीज प्रमुख अमृत एजाज होंगे, जिसमें पहला अमृत स्नान 2 अगस्त, 2027 को होगा. वह अब तक का सबसे लबा कुंग होगा, जिसके लिए महाराष्ट्र सरकार मच्च तैयारियां कर रही है. गुरु इस काल में नागर्मी वक्री गतियों से बहुभांति गोचर करेंगे, इसकी कथा समुद्र मंथन से प्रकटे अमृत कुंभ के लिए देव-दानवों के बीच हुए युद्ध से जुड़ी है.
पूजन-विधान तथा दान
आसन्न खरमास पौध मास में होगा. वराह पुराण, अध्याय-61 के अनुतार, सभी कामनाओं की पूर्ति करने वाला ‘काम व्रत’ इसी मास की शुक्ल पंचमी से प्रारंभ होता है. इसमें कार्तिकेय जी की पूजा-अर्चना लवं फलदायिनी है. प्रतिकूल ग्रह समर्चना और टान से साध्य है अतः अनिवार्य होने पर विशेष परिस्थितियों में सूर्य और गुरु की अर्चना, दान करके उनके अशुभत्व को शमित किया जा सकता है.
सूर्य के लिये 3ॐ घृणि सूर्याय नमः मंत्र का जप, लाल माणिक बायें हाथ की अनामिका में सोने की अंगूठी में धाराण तथा गेहूं, तांबा, घी, मसूर, गुड़ आदि का दान करे. गुरु के लिए ‘3ॐ वृं बृहस्पतये नमः मंत्र का जप, सोने की अंगूठी में पोखराज तर्जनी या अनामिका में धारण करें तथा चना दाल, हल्दी, पीला कपड़ा, स्वर्ण आदि का दान करें. कुप्रभाव शमित हो जायेगा, भगवन्नाम सब पर भारी है और पुरुषार्य का महत्व ज्योतिष शास्त्र भी स्वीकार करता है.
सद्गुरु ज्ञान
मनुष्य जन्म की शुरुआत सेवा से होती है और अंत भी उसी में. जीवन का आदि और अंत-यह दो ऐसी अवस्थाएं है, जब मनुष्य सर्वथा अशक्त-असमर्थ होता है, इसलिए उसे सहारे की आवश्यकता पड़ती है. इन दोनों का मध्यवर्ती अंतराल ही ऐसा है, जिसमें आदमी सबसे समर्थ, सशक्त और योग्य होता है.
यही वह काल है,
जब उसे स्वयं पर किये गये उपकारों के बदले समाज को उपकृत करके ऋण चुकाना पड़ता है. यदि वह ऐसा न करें और जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत सेवा लेता रहे, तो उसकी वह कृतघ्नता मरणोत्तर जीवन में ऐसा वज्राधात बनकर बरसती है, जिसके लिए उसके पास सिर्फ पछतावा ही शेष रहता है, इसलिए समझदार लोग सेवा की महत्ता को समझते और उसे अपनाते हैं.
उपाय, जो जीवन बदले
वास्तुशास्त्र के अनुसार, व्यवसाय करने वालों के लिए व्यापार वृद्धि यंत्र एक वरदान है. इस यंत्र को अपने कार्य स्थल या ऑफिस में स्थापित करें, इस यंत्र के सकारात्मक प्रभाव से धन लाभ, संतुष्टि व आर्थिक हानि का संकट दूर होता है. साथ ही व्यवसाय के विस्तार में मदद मिलती है.
ज्ञान गंगा
बिन स्वास्थ कैसे सहे, कोऊ करुवे बैन । लात खाय पुचकारिये, होय दुधारू छैन ।
भावार्थ: कवि वृंद कहते हैं कि बिना स्वार्थ के कोई भी व्यक्ति कड़वे वचन नहीं सहता. कड़वा वचन सभी को अप्रिय होता है, लेकिन स्वार्थी लोग उसे भी चुपचाप सुन लेते हैं, जैसे गाय के लात/पैर की मार खाने के बाद भी इंसान उसे दूलारता और पुचकारता है, क्योंकि दूध उसी से मिलना है.
पित्तरों के निमित्त पुण्यदायी है यह काल
अष्टादश पुराणों में मोक्षदायक पुराण के रूप में अलंकृत वायु पुराण के साथ-साथ अग्नि पुराण, वाराह पुराण, विष्णु पुराण और स्कंद पुराण आदि धर्म-साहित्यों में उल्लेख है कि पितृतीर्थ मोक्ष नगरी गयाजी में सभी समय में श्राद्ध-पिंडदान किया जा सकता है, पर इनमें पितृपक्ष महालया अर्थात् भाद्रपद पूर्णिमा से अश्विन अमावस्या तक की अवधि का विशेष महत्व है. साथ ही मार्गशीर्ष पूर्णिमा से पौष अमावस्या तक भी गयाजी में श्राद्ध-पिंडदान का शास्त्रोक्त विचान है.
यही कारण है कि
इससे ‘मिनी पितृपक्ष’ कहते हैं. साथ ही फाल्गुन पूर्णिमा से चैत्र अमावस्या और ज्येष्ठ पूर्णिमा से आषाढ़ अमावस्या तक की अवधि भी पितृकर्म-अनुष्ठान के लिए अति उत्तम माने जाते हैं. इस तरह से पितरों के नाम वर्ष में चार पक्ष स्वीकार किये गये हैं.
धर्मज्ञों के अनुसार,
एक वर्ष में 96 तिथि पितरों के तरनतारन हेतु सर्वाधिक उपयुक्त हैं. इनमें 12 अमावस्या, 14 युगादि तिथि, 14 मन्वादि तिथि, 12 संक्रांति, 12 वैधृति योग, 12 व्यतिपात योग, 15 महालया, पांच अष्टका, पांच अनविष्टका और पांच पुर्वेधु की गणना है.
वायु पुराण (105/47-48) में स्पष्ट अंकित है कि
मीन, मेष, कन्या, धनु एवं वृष राशि पर जब सूर्य हो, उस समय गया तीर्थ परम दुर्लभ है. ऋषिगण भी सर्वदा यह कहते आये हैं कि तीनों लोकों में गया का पिंडदान परम दुर्लभ है. विवरण है कि चंद्रमा के पुष्य नक्षत्र में होने के कारण ही इस मास को पौष कहा जाता है और इसी माह में खरमास भी आता है. इस माह में सूर्य के कन्या राशि में आने अर्थात् कनागत में होने वाले मुख्य पितृपक्ष के अलावा यह महीना भगवान विष्णु और सूर्य की उपासना के लिए उत्तम माना जाता है.
ऐसे तो पौष माह का पितृपक्ष पितरों के लिए परम कल्याणकारी है, लेकिन इस माह की अमावस्या का भी विशेष महत्व है. जानकार विद्वान पंडित कामेश्वर मिश्र शास्त्री बताते हैं कि
16 दिसंबर को जब धनु राशि में भगवान सूर्य प्रवेश करेंगे, इस दिन से तीर्थयात्रियों की भीड़ और भी बढ़ेगी. इसी दिन से खरमास की शुरुआत होगी तब पितरण पूजा ज्यादा प्रभावकारी माना गया है. मकर संक्रांति में गंगासागर जाने वाले गया धाम में पितरण कर्म करके ही आगे बढ़ते हैं और यह परंपरा पुरातन युग से आज तक बनी हुई है.
स्थानीय गयापाल विप्र ऋषिकेश गुदां बताते हैं कि
पौष पितृपक्ष में पड़ोसी देश नेपाल के अलावा संपूर्ण उत्तर भारत और पूर्वोत्तर के साथ-साथ महाराष्ट्र व गुजरात से भी तीर्थयात्रियों का गयाजी में आगमन हो रहा है. स्थानीय ब्राह्मण मुरारी जी पाठक का मानना है कि पीष मास में जिनका पिंडदान होता है, वे तुरंत वैकुंठ लोक में वास करने के लिए चले जाते हैं. पितृ दोष के शमन-दमन के लिए यह पक्ष उत्तम योग उपस्थित करता है.
शाश्वत परम ब्रह्म को पाने का महामंत्र
भासे गूंजता हुआ रत में करोड़ों जनों के कंठ से यह महामंत्र के रूप में करोड़ों के चित्त का आश्रय बना हुआ है. इस महामंत्र रूपी चिरंतन माला में राम और कृष्ण के साथ हरि को गूंथ कर गेय बना कर परमात्मीय महाऊर्जा में समाहित होने के लिए यानी लीन होने का समर्पण निवेदित है. हरे हरि का गेय स्वर है.
यहां राम, कृष्ण और हरे समझना है.
राम का अवतार एक मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में मान्य है. मर्यादा पुरुषोत्तम यानी धर्म के अवतार के रूप राम आये. जबकि कृष्ण को भारतीय मनीषा ने पूर्ण अवतार कहा है, इसलिए कृष्ण संपूर्णता में प्रकट होते हैं पूर्ण अवतार के रूप में.
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।।.
कृष्ण के जन्म से लेकर सभी लीलाओं में परमब्रह्म उत्तर आया, फिर भी राम और कृष्ण अवतार होते हुए किसी मां के गर्भ में आते हैं, लेकिन भारत के तत्व चिंतकों ने ईश्वर निराकार, प्रेमपूर्ण विवेकपूर्ण, चैतन्य माना है, लेकिन अनुभव जन्य है. तुलसी दास जी के शब्दों में ‘अकल, अनीह, अनाम अरूपा, अनुभव गम्य अखंड अनुपा’ बताया है. गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर ने भी अपने रूप और अरूप, सीमा और असीम वाले निबंध में कहा है- ‘इस संसार में सब कुछ चंचल है, सब कुछ गतिशील, परिवर्तनीय है,फिर भी संसार की स्थिति है.
यह एक अद्भुत विरोधाभास है, पर है सत्य.
समस्त संसरणशील वस्तुओं की अस्थिरता के होते हुए भी यह संसार ‘है’. इसका ‘है’ भाव ही सूचित करता है कि सभी चलायमान वस्तुओं के भीतर एक अविचल यानी स्थिर ‘सत्य’ प्रतिष्ठित है. जो लोग अनंत की साधना करते हैं और जो सत्य की उपलब्धि करना चाहते हैं, उन्हें बार-बार यह सोचना पड़ता है कि वे जो चारों ओर देख और जान रहे हैं, वह चरम सत्य नहीं है, वह अपने आप में स्वतंत्र नहीं हैं. उसमें एक अंतहीन गति है, अविराम अस्थिरता है. ये जो अंतहीन गति द्वारा अंतहीन स्थिति को निर्देश कर रहे हैं, वही हमारे चित्त का आश्रय और परम आनंद है.
इसलिए आध्यात्मिक साधना कभी भी रूप की साधना नहीं हो सकती.
वह समस्त रूपों के भीतर चंचल रूप के बंधन को अतिक्रम करके ध्रुव सत्य की और चलने और पाने की चेष्टा करती है. कोई भी इंद्रियगोचर वस्तु परम तत्व को देखना चाहती है तथा ये सारे खंड-वस्तु समूह केवल चल ही रहे हैं. कतार बांधकर खड़े हो कर रास्ता नहीं रोके हुए हैं, इसलिए हम अखंड सत्य और अक्षय पुरुष का संधान कर पाते हैं, इसलिए कबीर साहेब भी उस समस्त अस्थिर रूप राशि के भीतर स्थिर अरूप तत्व की ओर इशारा करते हैं.
कबीर साहेब कहते हैं कि
इस विनाश की दुनिया में एक मात्र अविनाशी तत्व राम हैं. नष्ट होते हुए शरीर को बचाना है, तो उस अविनश्वर की शरण में जाओ. लेकिन रूप और सीमा के द्वारा ही अरूप और असीम को पाने की और उन्मुख होते हैं. काँव शब्द और रूप का सहारा लेकर उस शाश्वत अरूप और परिव्याप्त असीम का दर्शन करता है. इसलिए रूप और अरूप गहरे तौर पर जुड़े हुए हैं और अभिन्न भी हैं.
इसलिए राम और कृष्ण जैसे पूर्ण अवतारों के माध्यम से छलांग लगा कर हम शाश्वत हरि से जुड़ते हैं.
लेकिन अवतार के रूप में भी तो किसी मां के गर्भ से जन्म लेना पड़ता है, इसलिए, भारतीय मनीषा भगवान विष्णु को हरि मानकर उसे शाश्वत ‘है’ मानता है और इसलिए राम और कृष्ण को शाश्वत हरि जोड़कर यह महामंत्र बन जाता है. इसमें गेयता भी सहज अविर्भूत हो जाता है. इसलिए ‘हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे|
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे’ महामंत्र है’
जहां पूर्ण अवतार राम, कृष्ण के साथ हरि को जोड़कर शाश्वत परम ब्रह्म परमात्मा में छलांग लगा परम आनंद को उपलब्ध होते हैं, जो सत्त, चित्त आनंद है, सत् यानी बराबर है और चित्त द्योतक है, चित्त परा चैतन्य का जिसका परिणाम आनंद है.
निष्कर्ष
खरमास कोई भय का समय नहीं, बल्कि संयम, साधना और आत्मशुद्धि का काल है। यदि इस अवधि में वर्जित कार्यों से बचकर दान, जप और भक्ति की जाए, तो जीवन में सकारात्मक परिवर्तन निश्चित रूप से देखने को मिलते हैं।
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