गणेश जी की बच्चपन की ये कहानियाँ आपके जीवन सवांर देंगी
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गणेश जी की बच्चपन की ये कहानियाँ आपके जीवन सवांर देंगी

गणेश जी की बच्चपन की ये कहानियाँ आपके जीवन सवांर देंगी- यद्यपि गणेश जी को हम गज मुख वाले देवता के रूप में पूजते हैं परंतु उनका यह रूप केवल हमें अनंत से जोड़ने का माध्यम है। गणेश जी इस सृष्टि के अस्तित्व का कारण है, उनसे ही सब प्रकट होता है, उनमें ही सब लीन हो जाता है।

गणेश-जी निराकार हैं, जो भक्त की सुविधा के लिए एक भव्य स्वरूप हैं। ‘गण’ का अर्थ है समूह। यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड अणुओं व विभिन्न ऊजर्जाओं का समूह है। यदि इन सभी विविध समूहों का संचालन करने वाला कोई सवर्वोच्च नियम न हो, तो यह सृष्टि अराजक हो जाए। अणुओं, ऊर्जाओं के अधिपति गणेश हैं। वे सबमें व्याप्त हैं। सृष्टि के व्यवस्थापक हैं।

गणेश-जी के हाथीमुख का क्या अर्थ है? हाथी ज्ञानशक्ति और कर्मशक्ति दोनों का प्रतीक है। हाथी के मुख्य गुण हैं, बुद्धि और सहजता। हाथी का विशाल मस्तक ज्ञान और विवेक का द्योतक है

गणेश जी का बड़ा पेट उदारता और पूर्ण स्वीकृति का प्रतीक है। वे एक हाथ से आशीर्वाद देते हैं और रक्षा करते हैं और नीचे की ओर उनका झुका हाथ निरंतर दान का प्रतीक है, स्मरण भी कराता है कि अंततः सब पृथ्वी में विलीन होंगे। उनका एक दांत एकाग्रता का द्योतक है। उनके हाथ का ‘अंकुश’ जागृति का और पाश नियंत्रण का प्रतीक है। दोनों ये संदेश देते हैं कि आंतरिक जागरण से उत्पन्न प्रचंड ऊर्जा को संयमित करना आवश्यक है।

अब प्रश्न उठता है कि हाथीमुख वाले गणेश जी की सवारी इतना छोटा सा चूहा (मूषक) क्यों है? लेकिन यह भी गहन प्रतीक है। जिस प्रकार चूहा रस्सियों को कुतर देता है, काट देता है। उसी प्रकार चूहा उस मंत्र का प्रतीक है, जो अज्ञान की परत दर परत को काटकर अंतिम ज्ञान तक ले जाता है, जिसका प्रतिनिधित्व गणेश जी करते हैं। चूहा तर्क का भी प्रतीक है। क्योंकि सही तर्क आपको आत्मज्ञान तक पहुंचा देता है।

हमारे ऋषि इतने सूक्ष्मदशों और बुद्धिमान थे कि उन्होंने दिव्यता को शब्दों में नहीं, बल्कि प्रतीकों में व्यक्त किया। शब्द समय के साथ बदल जाते हैं पर प्रतीक अचल रहते हैं। गणेश जी हमारे भीतर ही विद्यमान हैं। गणेश चतुर्थी उत्सव का प्रतीकात्मक सार है- हमारे भीतर छिपे गणेश-तत्व यानी ज्ञान, तर्क, दान और खुद पर नियंत्रण जैसे गुणों को खुद में जाग्रत करना है।

एक बार माता पार्वती स्नान करने गईं और उन्होंने छोटे गणेश जी से कहा – “तुम मेरे द्वार पर पहरा देना, जब तक मैं न कहूँ किसी को अंदर मत आने देना।”
तभी भगवान शिव आए, गणेश जी ने उन्हें भी रोक दिया। इससे क्रोधित होकर शिवजी ने युद्ध कर दिया और गणेश जी का सिर काट दिया। बाद में माता पार्वती की प्रार्थना से शिवजी ने गणेश जी को हाथी का सिर लगाकर पुनर्जीवित किया।

सीख: आज्ञापालन, कर्तव्यनिष्ठा और माता-पिता के आदेश को सर्वोपरि मानना।

असुर सिंधु का वध करने के लिए गणेश जी ने अवतार लिया था। सिंधु ने अमृत-कुंभनिगल लिया था। इससे वह अमर और अजेय हो गया था। एक बार बाल गणेश आम के पेड़ पर चढ़कर खेल रहे थे। इस बीच पेड़ से एक अंडा गिरा। अंडे से पोर निकला, जिस पर सवार होकर उन्होंने सिंधु से अमृत-कुंभ छीन लिया। बाद में मोर उन्होंने कार्तिकय को भेंट कर दिया। उनके इस मोर की सवारी के कारण ही महाराष्ट्र में आज भी ‘गणपति चप्पा मोरया’ का जयघोष गूंजता है। ऊं नमी विनराजय सर्वसौख्यप्रदायिने।

भावार्थ सभी दुखों को दूर करने वाले और सुखों को देने वाले विघ्नराज गणेश, आपको नमस्कार।

कुबेर देवताओं के खजांची थे और शिवजी के भक्त भी। कुबेर ने देखा कि शिव के पुत्र गणेश स्थूलकाय हैं और मिष्ठान के बड़े शौकीन हैं। कुबेर को लगा कि शायद गणेश जी अक्सर भूखे ही सो जाते होंगे। दया करके उन्होंने गणेश जी को कहा- ‘आओ, मैं तुम्हें भरपेट भोजन कराऊंगा। पर गणेश जी खाते गए और उनके भंडार खाली हो गए। कुबेर समाझ गए कि भगवान को धन से नहीं, विनम्रता से प्रसन्न किया जा सकता है। अंततः उन्होंने क्षमा मांगी और सिर झुका दिया। गावातीताव मक्तानां कामपूराव ते नमः।

भावार्थ हर तरह की माया और भ्रम से दूर रखने वाले, भक्तों की कामनाओं को पूरा करने वाले गणराज को नमस्कार।

बाल गणेश को मित्रों संग खेलते-खेलते भूख लगने लगी। गणेश जी चुपके से गौतम ऋषि के आश्रम में रसोई में घुसे च मित्रों संग भोजन खाने लगे। जब अऋषि को पता चला तो वे गणेश की माता पार्वती के पास ले गए। पार्वती जी ने गणेश को कुटिया में बांध दिया। लेकिन फिर पार्वती जी को हर जगह गणेश दिखाई देने लगे। कहीं वे खेलते, कहीं खाते और कहीं रोते दिखे। पर जाकर देखा तो गणेश रस्सी छुड़ाने का प्रयास कर रहे थे। माता ने उन्हें मुक्त कर दिया। जिलोकेश गुणातीत गुणक्षेम नमो नमः।

भावार्थ तीनों लोकों का पालन करने बाले, विश्व में हर जगह व्याप्त गणेशजी, आपको नमस्कार।

महर्षि वेदव्यास महाभारत लिखने के लिए ऐसे लेखक की तलाश कर रहे थे, जो इतना बड़ा काम कर सके। उन्होंने गणेश जी को यह कार्य सौंपा, लेकिन गणेश जी ने शर्त रखी कि बिना स्के लिखखेंगे। वेदव्यास जी ने भी एक शर्त रखी कि गणेश जो भी लिखेंगे, उसे समझकर ही लिखेंगे। वेदव्यास ने कहा- हर श्लोक को समझकर ही लिखना। गणेश जी धैर्य और बुद्धि से बिना थके लिखते गए। कठिन चंदों को समझने में वे ठहरते और इस बीच वेदव्यास विश्राम कर लेते। सिद्धिबुद्धिपतये नमः।

भावार्थ सिद्धियां और बुद्धि देने बाले गणेश, आपको नमस्कार। – पं. गणेश मिश्र, असि. प्रोफेसर, कुमार भारकर वर्मा संस्कृत विषि, असम

गणेश जी की ये बचपन की कहानियाँ हमें आज्ञापालन, माता-पिता का सम्मान, दूसरों का उपहास न करना, और शिक्षा का महत्व समझाती हैं। अगर कोई व्यक्ति इन बातों को अपने जीवन में उतार ले, तो निश्चित ही उसका जीवन संवर जाएगा।

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