सरस्वती पूजा ऐसे करें- माँ शारदे देगा विधा बुद्धि धन दौलत

By: arcarrierpoint

On: Thursday, January 22, 2026 8:48 PM

सरस्वती पूजा ऐसे करें- माँ शारदे देगा विधा बुद्धि धन दौलत
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सरस्वती पूजा ऐसे करें- माँ शारदे देगा विधा बुद्धि धन दौलत:-सरस्वती पूजा हिंदू धर्म की एक अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण पूजा है। माँ सरस्वती को विद्या, बुद्धि, ज्ञान, कला और वाणी की देवी माना जाता है। विशेष रूप से छात्र-छात्राओं, शिक्षकों, कलाकारों और विद्या से जुड़े सभी लोगों के लिए यह पूजा अत्यधिक फलदायी मानी जाती है। मान्यता है कि यदि सरस्वती पूजा सही विधि और नियम से की जाए, तो माँ शारदे न केवल विद्या और बुद्धि प्रदान करती हैं, बल्कि धन, वैभव और जीवन में सफलता का मार्ग भी प्रशस्त करती हैं।

इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि सरस्वती पूजा कैसे करें, पूजा का सही समय, नियम, मंत्र, क्या करें-क्या न करें, और माँ सरस्वती को प्रसन्न करने के अचूक उपाय।

काल वसत पंचती है मान्यताओं के अनुसार, वसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती अवतरित हुई थी, इसलिए इस दिन विद्या की देवी मां सरस्वती की पूजा की जाती है मान्यता है कि वसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की उपासना से सभी मनोकामना! पूर्ण होती है. विशेष रूप से शिया और ज्ञान से जुड़े लोगों के लिए यह दिन अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है. शहर के अधिकांश शैक्षिक संस्थानों में पूजा की तैयारियां पूरी हो चुकी है. बाजार में सरस्वती प्रतिमाएं सज चुकी है, और लोग पूजन सामग्री, मूर्तियों तथा फलों की खरीदारी में व्यस्त है.

आचार्य बिंदेश्वर शास्त्री के अनुसार वाराणसी पंचांग में माघ शुक्ल पंचमी तिथि का आरंभ 23 जनवरी की रात 1:18 बजे से होकर 24 जनवरी की रात 12:08 बजे तक रहेगा. वहीं मिथिला-भेदेही पंचांग के अनुसार पंचमी तिथि 23 जनवरी की रात 1:31 बजे से 24 जनवरी की रात 12:21 बजे तक मानी जायेगी, उदयातिथि के अनुसार 23 जनवरी को ही वसंत पंचमी पर्व मनाना सर्वमान्य है, सरस्वती पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 7:13 बजे से दोपहर 2:33 बजे तक रहेगा.

इस अवधि में पूजा, विद्यारंभ, पुस्तक-पूजन और कला-रख्धना विशेष फलदायी मानी जाती है. आचार्य शास्त्री बताते है कि वसंत पंचमी माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है और मान्यता है कि इसी दिन भगवती सरस्वती का अवतरण हुआ था. देशी सरस्वती को ब्रह्मा की मानस पुत्री माना गया है, जो अज्ञानरूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान, विवेक और सदुद्धि प्रदान करती है.

सरस्वती पूजा में को लेकर बाजार में मां शारदे की विभिन्न आकार की मूर्तिथी. पूजन सामी, मां की श्रृंगार सामग्री, रंगीन और शिटेज चुनरी, मोती, माला, मुकुट से बाजार पटा हुआ है, मां शारदे कहीं हंस पर सवार है, तो कही वोगा पुस्तक चारण की हुई है. कई श्रद्धालु भीड़ से बचने के लिए अभी से पूजन सामग्री खरीद रहे हैं. पूजन सामग्री में विद्या की देवी के लिए सबसे महत्वपूर्ण कालम-दवात की मांग अधिक है.

पटना यूनिवर्सिटी के छक्रयासों में सरस्वती पूजा की तैयारियां जोरों पर है. चीएन कॉलेज के मेन हॉस्टल में 10-12 फीट ऊंची मां सरस्वती की भव्य प्रतिमा स्थापित की जायेगी. पटना कॉलेज के जैवसन हॉस्टल में स्थायी प्रतिमा के साथ पंडाल सजाया गया है.

सैदपुर हॉस्टल में विशाल पंचाल और भव्य प्रतिना स्थापित होगी, पटेल छात्रावास, सायंस कॉलेज और कला महाविद्यालय में भी पूज्य के लिए खास इंतजाम किये गये है. इस बार पटना के महिला कॉलेजों में छात्राएं धूमधाम से सरस्वती पूजा मनाने जा रही है. पीपीयू के तहत आने वाले जेडी वीमेंस कॉलेज, गंगा देवी महिला कॉलेज, श्रीअरविंद महिला कॉलेज और मगध महिला कॉलेज में पूजा की तैयारियों जोरों पर है.

मगध महिला कॉलिंग के महिमा छात्रावास में पूजा आयोजित की जायेगी, जहां सभी छात्राएं मिलकर पहाल सजाने और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तैयारी कर रही है. 23 जनधरी को टीचर्स और छात्राएं एक साथ पूजा करेंगी, जेडी वीमेंस कॉलेज की प्राचार्या प्रो मीरा कुमारी ने बताया कि कॉलेज के मंदिर में प्रतिमा स्थापित की जायेगी और सभी रजप पारंपरिक परिधानों में पूजा में भाग लेगी|

माध माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला वसंत पंचमी का पर्व इस वर्ष 23 जनवरी, शुक्रवार मनाया जायेगा, इस दिन विद्या की आराध्य देवी मां सरस्वती की पूजा होती है, जो ज्ञान, वाणी और कला की देवी मानी जाती है. पटना में सरस्वती पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह शहर की शैक्षिक, सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना का प्रतीक बन चुकी है.

प्राचीन पाटलिपुत्र से लेकर आधुनिक पटना तक मां सरस्वत्ती की पूजा की परंपरा सदियों से निरंतर चली आ रही है. यही कारण है कि यहां सरस्वती पूजा न केवल आस्था का पर्व है, बल्कि यह एक बौद्धिक और सांस्कृतिक उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है, जी लोगों के बीच ज्ञान और संस्कृति की महत्वपूर्ण भूमिका की उजागर करता है.

वसंत पंचमी उत्साह, उमंग और नवचेतना का पर्व है, जो नये जीवन की शुरुआत का प्रतीक है. पटना में सरस्वती पूजा सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि शैक्षिक, सास्कृतिक और सामाजिक जागरूकता का जीता-जागता उदाहरण है. पटना कॉलेज, अशोक राजपथ, लंगर टोली, कदमकुआं, बोरिंग रोड जैसे ऐतिहासिक इलाकों में कई पूजा समितियां 70 से 100 साल पुरानी है, जो इस पर्व को धूमधाम से मनाती है. आइए जानें इन समितियों की धार्मिक अनुष्ठान और स्थानीय परंपराओं से जुड़ी खास बातें….

इतिहासकार अरविंद महाजन कहते हैं- प्राचीन काल में पाटलिपुत्र मौर्य और गुप्त साम्राज्य के समय ज्ञान, प्रशासन और शिक्षा का प्रमुख केंद्र था. नालदा और विक्रमशिला जैसे महाविहारों की परंपरा ने इस क्षेत्र को विद्या की भूमि के रूप में प्रतिष्ठित किया, लॉक मान्यता रही है कि जहां ज्ञान की साधना होती है वहां मां सरस्वती स्वयं विराजती है. इसी सांस्कृतिक विरासत ने पटना मैं सरस्वती पूजा को विशेष सम्मान दिलाया.

ब्रिटिश काल में पटना शिक्षा का एक बड़ा केंद्र बनकर उभरा. पटना कॉलेज (1863), बीएन कॉलेज और पटना विश्वविद्यालय (1917) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों की स्थापना के साथ ही सरस्वती पूजा ने छात्र जीवन में उत्सवात्मक स्वरूप ग्रहण किया, महाजन के अनुसार विशेषकर 1920-30 के दशक में, छात्र आदोलनों और राष्ट्रवादी चेतना के साथ यह पूजा सामहिक सामाजिक आयोजन बन गया, यहीं से पूजा संघ और समितियों की संगठित परंपरा शुरू हुई.

पटना कॉलेज इलाकर, अशोक राजपथ, लंगर टोली, कदमकुआं, मखनिया कुआ, मुसल्लाध्पुर हाट, बोरिंग रोड, कंकड़बाग, काजीपुर, नया टोला, महेंद्र और जिन्द्र नगर जैसे इलाकों में कई ऐसे सरस्वती पूजा सथ है जिनकी स्थापना 70 से 100 वर्ष पहले हुई थी. प्रारंभ में ये संघ छात्र-छात्राओं द्वारा गठित किये गये थे, जिनका उद्देश्य पूजा के साथ कवि सम्मेलन, वाद-विवाद प्रतियोगिता, हस्तलिखित पत्रिकाएं, संगीत और नाट्य प्रस्तुतियां भी आयोजित कराना था.

पटना की सरस्वती पूजा में अक्षरारंभ (हते खौड़ी। की विशेष परंपरा है, जिसमें बसंत पंचमी के दिन छोटे बच्चों की शिक्षा की गुरुउयत कराई जाती है, छात्र अपनी पुस्तकें और कलम मों के चरणों में अर्पित करते हैं. पीले चावल (मीठा भात), बूंदी के लड्डू, मालपुआ और मौसमी फल भोग के रूप में बढ़ाए जाते है. बसंती रंग पूरे शहर में वसत और ऊर्जा का संदेशा देता है.

1980-90 के दशक के बाद बड़े पंडाल, आधुनिक सजावट और लाइटिंग का चलन बढ़ा, लेकिन इसके बावजूद पुराने पूजा संघ आज भी सादगी, अनुशासन, विद्यी और सरकार को केंद्र में रखकर सरस्वती पूजा की परंपरा को जीवित रखने का प्रयास कर रहे है, यही संतुलन पटना की सरस्वती पूजा को विशिष्ट पहचान देता है.

  • 70-100 साल पुरानी हैं पटना की सरस्वती पूजा समितियां और संघ
  • ब्रिटिश काल से पटना का शिक्षा व सरस्वती पूजा से रहा है गहरा संबंध

रा रस्वती चतुथों की परंपरा अपेक्षाकृत नयी है मगर आज अत्यंत सामयिक और सार्थक ज्ञान और विद्या की विकास धारा सरस्वती की अविरल बात्रा है. सदियों से सर्व मंगलकारी गणेश की पूजा-अर्चना हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रही है, जिसे बाल गंगाधर तिलक ने गणेश चतुर्थी के रूप में धार्मिक व सांस्कृतिक पर्व का स्वरूप दिया था. उसी तरह ज्ञान और संस्कर को संवर्धित करने की दिशा में सरस्वती की साधना को धार्मिक अनुष्ठान की तरह प्रतिष्ठित करने की अपेक्षा है.

जिस तरह दीपावली के पूर्व धनतेरस के अवसर पर बर्तन सारीदने की परंपरा है, क्या ही अच्छा हो कि हम वसंत पंचमी के एक दिन पूर्व सरस्वती चतुर्थी की नेक परंपरा का श्रीगणेश करें और उस दिन हर विद्या प्रेमी पुस्तक खरीदें, इससे पुस्तक संस्कृति का विकास होगा और सरस्वती पुजन में एक सार्थक आयाम जुड़ेगा.

वसंत पंचमी से पहले सरस्वती चतुर्थी की परंपरा इस दृष्टि से उपयुक्त है कि वसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा होती है. विद्यालयों में, शहर-देशात में जगह-जगह सरस्वती की मूर्तियां स्थापित की जाती हैं और उनकी पूजा की जाती है. इस अवसर पर पुस्तकों की खरीदारी को प्रोत्साहित करना स्वाभाविक हो है, क्योंकि पुस्तके खुद सरस्वती के रूप हैं. पुस्तक प्रेम भी सरस्वती की पूजा और श्रद्धा है.

साथ ही, आजकल कई पुरानी परंपराएं निरर्थक और बेमानी हो चुकी हैं, जिनों नयी और उपयोगी परंपराओं से बदलने की आवश्यकता है. ऐसे में, वसंत पंचमी के एक दिन पहले सरस्वती चतुर्थी की परंपरा हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रख सकती है. इसे आगे बढ़ाने और लोकप्रिय बनाने की आवश्यकता है.

सरस्वती पूजा मुख्य रूप से बसंत पंचमी के दिन मनाई जाती है। बसंत पंचमी को ऋतु परिवर्तन का पर्व भी कहा जाता है, जो जीवन में नई ऊर्जा, उत्साह और सृजन का प्रतीक है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार—

  • माँ सरस्वती की पूजा से ज्ञान और विवेक की प्राप्ति होती है
  • पढ़ाई में मन लगता है और एकाग्रता बढ़ती है
  • कला, संगीत, लेखन और वाणी में निखार आता है
  • जीवन से अज्ञानता और नकारात्मकता दूर होती है

इसी कारण इस दिन किताबें, कलम, वाद्य यंत्र और पढ़ाई से जुड़ी वस्तुओं की पूजा की जाती है।

सरस्वती पूजा का आयोजन बसंत पंचमी तिथि को किया जाता है। पंचांग के अनुसार पूजा का समय हर वर्ष बदलता रहता है, लेकिन सामान्यतः—

  • प्रातःकाल से लेकर अपराह्न तक पूजा का विशेष महत्व होता है
  • विद्यारंभ (बच्चों को पहली बार अक्षर लिखवाना) इसी दिन शुभ माना जाता है

पूजा हमेशा शुभ मुहूर्त में ही करनी चाहिए ताकि पूर्ण फल प्राप्त हो।

  • पूजा स्थल को साफ-सुथरा रखें
  • पीले या सफेद कपड़े का आसन बिछाएं
  • माँ सरस्वती की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें

सरस्वती पूजा में निम्न सामग्री आवश्यक होती है—

  • माँ सरस्वती की मूर्ति या फोटो
  • पीले फूल और माला
  • अक्षत (चावल)
  • हल्दी, चंदन
  • धूप, दीप
  • मिठाई (खीर विशेष रूप से)
  • किताबें, कॉपी, कलम, वाद्य यंत्र
  • स्नान कर स्वच्छ पीले या सफेद वस्त्र धारण करें
  • पूजा स्थल पर बैठकर माँ सरस्वती का ध्यान करें
  • दीप प्रज्वलित कर पूजा आरंभ करें

पूजा के समय इन मंत्रों का जाप अत्यंत लाभकारी माना जाता है—

ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः

या कुन्देन्दु तुषार हार धवला
या शुभ्र वस्त्रावृता

या वीणा वरदण्ड मण्डित करा
या श्वेत पद्मासना

इन मंत्रों का कम से कम 108 बार जाप करें।

  • पूजा के दिन अध्ययन और लेखन का अभ्यास करें
  • बच्चों को अक्षर ज्ञान दिलाएं
  • किताबों और कलम का सम्मान करें
  • पीले रंग के वस्त्र और भोजन अपनाएं
  • संयम और पवित्रता बनाए रखें
  • पूजा के दिन मांस, मदिरा और तामसिक भोजन न करें
  • झूठ, क्रोध और अपशब्दों से बचें
  • पूजा स्थल पर गंदगी न फैलाएं
  • किताबों का अपमान न करें
  • पूजा के समय मोबाइल और व्यर्थ बातों से दूर रहें

सही विधि से सरस्वती पूजा करने पर—

  • पढ़ाई में बाधाएं दूर होती हैं
  • स्मरण शक्ति और एकाग्रता बढ़ती है
  • प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता मिलती है
  • कला और संगीत में निपुणता आती है
  • जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है

धार्मिक मान्यता है कि माँ सरस्वती की कृपा से विद्या के साथ-साथ धन और सामाजिक सम्मान भी प्राप्त होता है।

सरस्वती पूजा के दिन पुस्तकों की पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन—

  • नई किताबें खरीदना शुभ माना जाता है
  • पुरानी पुस्तकों की सफाई कर पूजा की जाती है
  • माना जाता है कि इससे ज्ञान में वृद्धि होती है

इसी कारण कई स्थानों पर इस दिन “पुस्तक पूजन” की परंपरा भी निभाई जाती है।

सरस्वती पूजा छात्रों के लिए अत्यंत लाभकारी मानी जाती है—

  • परीक्षा में सफलता के लिए
  • पढ़ाई में मन लगाने के लिए
  • मानसिक तनाव दूर करने के लिए

कई माता-पिता इस दिन बच्चों को पहली बार कलम पकड़वाते हैं, जिसे विद्यारंभ संस्कार कहा जाता है।

सरस्वती पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि ज्ञान, अनुशासन और सकारात्मक जीवन का प्रतीक है। यदि इसे श्रद्धा, नियम और सही विधि से किया जाए, तो माँ शारदे की कृपा निश्चित रूप से प्राप्त होती है। विद्या, बुद्धि, विवेक के साथ-साथ जीवन में सफलता और समृद्धि भी मिलती है।

इसलिए बसंत पंचमी के पावन अवसर पर सरस्वती पूजा अवश्य करें और माँ शारदे का आशीर्वाद प्राप्त करें।

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