13 महिनों का होगा 2026 | पढीए मालमास की पूरी जानकारी

By: arcarrierpoint

On: Saturday, January 10, 2026 10:33 AM

मालमास की पूरी जानकारी
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13 महिनों का होगा 2026- हिंदू नववर्ष विक्रम संवत 2083 का शुभारंभ 19 मार्च 2026 से होगा। इसी दिन से वासंती नवरात्र की शुरुआत भी होगी। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार यह नव संवत विशेष रहेगा, क्योंकि यह सामान्य 12 नहीं बल्कि 13 महीनों का होगा। इस वर्ष अधिकमास (मलमास/पुरुषोत्तम मास) का संयोग बन रहा है, जो 17 मई से 15 जून 2026 तक रहेगा। इस कारण वर्ष के अधिकांश व्रत-त्योहार 15 से 20 दिन की देरी से होंगे। ज्योतिष गणना के अनुसार नवसंवत 2083 के राजा देवगुरु बृहस्पति और मंत्री मंगल होंगे। चंद्रमा को मेघेश, फलेश और दुर्गेश का दायित्व प्राप्त होगा।

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार सूर्य और चंद्र कैलेंडर के बीच के अंतर के कारण अधिकमास आता है। सौर वर्ष 365 दिन का होता है, जबकि चंद्र वर्ष 354 दिन का। यह अंतर लगभग हर तीन वर्ष में इतना बढ़ जाता है कि पंचांग को संतुलित करने के लिए एक अतिरिक्त महीना जोड़ना पड़ता है। इसी को अधिकमास, मलमास या पुरुषोत्तम मास कहा जाता है।

धार्मिक परंपराओं के अनुसार अधिकमास में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण, भूमि पूजन या नए व्यवसाय की शुरुआत जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। मान्यता है कि इस अवधि में ग्रह-नक्षत्र शुभ कार्यों के अनुकूल नहीं होते।

अधिकमास को आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र माना गया है। मान्यता है कि इस माह को भगवान विष्णु का संरक्षण प्राप्त है, इसलिए इसे पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। यह समय तप, जप, ध्यान, भक्ति और दान के लिए श्रेष्ठ माना गया है। धार्मिक विश्वास है कि इस अवधि में की गई साधना से पापों का क्षय होता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। पंचांग के अनुसार यह पवित्र माह लगभग हर तीन वर्ष में एक बार आता है और पंचांगीय संतुलन के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति का विशेष अवसर प्रदान करता है।

सौर वर्ष (लगभग 365 दिन) और चंद्र वर्ष (लगभग 354 दिन) के बीच लगभग 11 दिन का अंतर होता है, जो हर तीन साल में एक महीने के बराबर हो जाता है. इस अंतर को ठीक करने के लिए एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिकमास कहते हैं.

अधिकमास को अलग-अलग शास्त्रों और परंपराओं में विभिन्न नामों से जाना जाता है- अधिकमास, मलमास, पुरुषोत्तम मास धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस माह को भगवान विष्णु का संरक्षण प्राप्त है, इसलिए इसे पुरुषोत्तम मास कहा गया।

भारतीय पंचांग दो प्रकार की गणनाओं पर आधारित होता है—

  1. सौर गणना (सूर्य पर आधारित)
  2. चंद्र गणना (चंद्रमा पर आधारित)
गणना का प्रकारकुल दिन
सौर वर्षलगभग 365 दिन
चंद्र वर्षलगभग 354 दिन

हर वर्ष लगभग 11 दिनों का अंतर बनता है। यह अंतर लगातार बढ़ता रहता है और लगभग तीन वर्षों में 30 दिनों (एक माह) के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को संतुलित करने के लिए पंचांग में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे ही अधिकमास कहा जाता है।

सूर्य की धीमी गति: ज्योतिष के अनुसार, इस दौरान सूर्य की गति धीमी हो जाती है, जिससे कोई भी नया काम सफल नहीं होता। ‘मलिन’ मास: इस महीने को ‘मलिन’ (गंदा) माना जाता है, इसलिए इसमें कोई भी नया और शुभ कार्य शुरू नहीं किया जाता, क्योंकि यह अशुभ फल दे सकता है।

अशुभता: विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन, नामकरण, भूमि-मकान खरीदना जैसे काम वर्जित माने जाते हैं, क्योंकि इस महीने में किए गए शुभ कार्यों से मिलने वाले लाभ में कमी आती है।

पंचांग के अनुसार-

  • अधिकमास लगभग हर 3 वर्ष में एक बार आता है
  • इसका उद्देश्य चंद्र और सौर गणना के बीच संतुलन बनाए रखना है

यह भारतीय समय-गणना प्रणाली की वैज्ञानिक परिपक्वता को दर्शाता है।

वर्ष 2026 का 13 महीनों का होना भारतीय पंचांग की वैज्ञानिक और सांस्कृतिक गहराई को दर्शाता है। अधिकमास न केवल समय-गणना को संतुलित करता है, बल्कि समाज को आत्मचिंतन, संयम और आध्यात्मिक उन्नति का अवसर भी प्रदान करता है।

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