2 मार्च को होलिका दहन और 4 मार्च को होली – देखें शुभ मुहूर्त

By: arcarrierpoint

On: Wednesday, February 11, 2026 11:59 AM

2 मार्च को होलिका दहन और 4 मार्च को होली - देखें शुभ मुहूर्त
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2 मार्च को होलिका दहन और 4 मार्च को होली- फाल्गुन शुक्ल की पूर्णिमा दो दिन होने से इस बार होलिका दहन के एक दिन बाद यानी 4 मार्च को होली मनाई जाएगी। फाल्गुन पूर्णिमा का व्रत 2 मार्च सोमवार को और स्नान-दान की पूर्णिमा 3 मार्च मंगलवार को है। 2 मार्च को शाम 5:18 बजे से भद्रा चढ़ रहा है और 3 की सुबह 4:56 बजे तक रहेगा। होलिका दहन में भद्रा के मुख का परित्याग किया जाता है।

जबकि पूंछ को ग्रहण किया जाता है, इसलिए होलिका दहन 2 मार्च को भद्रा पूंछ में रात्रि 12:50 बजे किया जाएगा। 3 मार्च को स्नान-दान की पूर्णिमा मनाई जाएगी। ज्योतिषाचार्य राकेश झा ने बताया कि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नियम बताए गए हैं। पहला पूर्णिमा तिथि, दूसरा भद्रा मुक्त काल व तीसरा रात्रि का समय होना चाहिए। भद्रा में श्रावणी कर्म एवं फाल्गुनी कर्म वर्जित है। 2 मार्च की रात में पूर्णिमा तिथि व मघा नक्षत्र में होलिका दहन होगा। वहीं मंगलवार 3 मार्च को सूर्योदय कालीन पूर्णिमा, स्नान-दान की पूर्णिमा और कुलदेवता को सिंदूर अर्पण किया जाएगा।

होलिका दहन के दिन होलिका की पूजा में अक्षत, गंगाजल, रोली-चंदन, मौली, हल्दी, दीपक, मिष्ठान आदि से पूजनोपरांत उसमें आटा, गुड़, कर्पूर, तिल, धुप, गुगुल, जी, घी, आम की लकड़ी और गाय के गोबर से बने उपले या गोइठा डालकर सात बार परिक्रमा करने से परिवार की सुख-शांति, समृद्धि में वृद्धि, नकारात्मकता का ह्रास, रोग-शोक से मुक्ति व मनोकामना की पूर्ति होती है।

13 फरवरी को विजया एकादशी, 15 फरवरी को महाशिवरात्रि, 27 फरवरी को आमलकी एकादशी व्रत व रंगभरी एकादशी, 28 फरवरी को गोविंद द्वादशी और 2 मार्च को होलिका दहन है।

  • लाल रंग का महत्वः ज्योतिष शास्त्र के अनुसार लाल रंग ऊर्जा, शक्ति, भूमि, भवन, साहस व पराक्रम का प्रतीक है। इस रंग के प्रयोग से मंगल ग्रह भी प्रसन्न रहते हैं। लाल रंग से होली खेलने से स्वास्थ्य और यश में वृद्धि होती है।
  • पीला रंगः सौंदर्य व आध्यात्मिक तेज को निखरता है। पीले वस्त्र के इस्तेमाल से देवगुरु बृहस्पति भी प्रसन्न होकर कृपा बरसाते हैं।
  • नारंगी रंगः नारंगी रंग ज्ञान, ऊर्जा, शक्ति, प्रेम व आनंद का प्रतीक है। यह रंग लाल और पीले से मिलकर प्रकट होता है। जीवन में इसके प्रयोग से मंगल व गुरु दोनों ग्रहों की कृपा तो बनी ही रहती है, साथ ही सूर्यदेव की भी कृपा बरसती है।
  • नीला रंगः नीला रंग भगवान शिव के गुण और भाव को प्रदर्शित करता है। यह रंग साफ-सुथरा निष्पापी, पारदर्शी, करुणामय अऔर उच्च विचार होने का सूचक है। यह रंग आसमान और पानी का प्रतिनिधित्व करता है।
  • हरा रंगः हरा रंग, समृद्धि, उत्कर्ष, प्रेम, दया, प्रगति, प्रकृति, सुकून, हीलिंग, प्रचुरता, तरक्की एवं सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। हरे रंग के प्रयोग से बुध की कृपा बनी रहती है।
  • बैंगनी रंगः पर्पल या बैंगनी रंग विलासिता, रईसी, आत्मसम्मान और संतुलन का प्रतीक है। यह रंग पवित्रता व मासूमियत को दर्शाता है।
  • गुलाबी रंगः गुलाबी रंग प्यार, खूबसूरती, जोश एवं रोमांस का प्रतीक है। जीवन को आनंदमय बनाने के लिए इस रंग से होली खेलनी चाहिए।

पंचांग गणना के अनुसार:

  • पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 2 मार्च, शाम लगभग 5:56 बजे
  • पूर्णिमा तिथि समाप्त: 3 मार्च, शाम लगभग 5:08 बजे
  • भद्रा काल: 2 मार्च शाम 5:18 बजे से 3 मार्च सुबह लगभग 4:56 बजे तक

शास्त्रीय नियम क्या कहते हैं?

होलिका दहन के लिए तीन मुख्य बातें आवश्यक मानी गई हैं:

  1. पूर्णिमा तिथि हो
  2. प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का समय) हो
  3. भद्रा मुख न हो

शास्त्रों के अनुसार, भद्रा के मुख में होलिका दहन वर्जित है, लेकिन भद्रा की पूंछ में किया जा सकता है। इसी आधार पर पंचांग विशेषज्ञों की राय है कि होलिका दहन 2 मार्च की रात किया जाएगा। दुल्हंडी (रंग वाली होली) 4 मार्च को मनाई जाएगी।

2 मार्च को प्रदोष काल शाम 6:22 बजे से रात 8:53 बजे तक रहेगा। हालांकि भद्रा भी इसी दौरान रहेगी, लेकिन यह भद्रा मुख नहीं होगी। इसलिए 2 मार्च को ही होलिका दहन शास्त्रसम्मत और शुभ माना गया है। रात्रि में लगभग 12:50 बजे भद्रा पूंछ काल में भी दहन किया जा सकता है।

  • सूर्योदय कालीन पूर्णिमा रहेगी
  • स्नान-दान की पूर्णिमा मनाई जाएगी
  • कुलदेवता को सिंदूर अर्पित करने की परंपरा निभाई जाएगी

धार्मिक दृष्टि से यह दिन पुण्य कर्म और दान के लिए श्रेष्ठ माना गया है।

होलिका दहन केवल परंपरा नहीं, बल्कि आस्था और आंतरिक शुद्धि का प्रतीक है। पौराणिक कथा के अनुसार, भक्त प्रह्लाद भगवान विष्णु के परम भक्त थे। उनके पिता हिरण्यकश्यप ने उन्हें कई बार मारने की कोशिश की। अंत में उसने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठे। होलिका को अग्नि से न जलने का वरदान था। लेकिन अहंकार और अधर्म के कारण वह स्वयं जल गई और भक्त प्रह्लाद सुरक्षित रहे।

इसी घटना की स्मृति में हर वर्ष होलिका दहन किया जाता है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता है।

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इस बार पूर्णिमा दो दिन पड़ने के कारण भ्रम की स्थिति बनी है, लेकिन पंचांग गणना और शास्त्रीय नियम स्पष्ट करते हैं कि:

लिका दहन – 2 मार्च (रात्रि में)
स्नान-दान पूर्णिमा – 3 मार्च
रंगों की होली (दुल्हंडी) – 4 मार्च

यदि आप सही मुहूर्त में पूजा करना चाहते हैं, तो 2 मार्च की रात्रि को होलिका दहन करें और 4 मार्च को रंगोत्सव मनाएँ।

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