कम संसाधन मे रह कर अरबपति कैसे बने? जानिए सुंदर पिचाई से:-संघर्ष की कहानी सुंदर पिचाई, गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई से जानिए अरबपति बनने का मंत्र!
दो कमरों वाले घर में रहे, पानी के लिए कतारों में लगे, अब अरबपति हैं सुंदर
गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई (53) किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। सुंदर चर्चा में हैं, क्योंकि हाल ही में वे अरबपतियों की सूची में शामिल हो गए हैं। उनकी संपत्ति करीब 10 हजार करोड़ रुपए आंकी गई है। सुंदर के जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए हैं। जानते हैं उनकी संघर्ष से सफलता की कहानी…
संघर्षः आर्थिक तंगी झेली, घर में लंबे समय तक नहीं था फोन
सुंदर पिचाई का जन्म 10 जून 1972 को तमिलनाडु के एक साधारण परिवार में हुआ था। वे अपने माता-पिता और भाई के साथ दो कमरों के छोटे से घर में रहते थे। इस घर को वे किराएदारों के साथ साझा करते थे। सुंदर अपने भाई के साथ लिविंग रूम में जमीन पर सोते थे। पिता की आमदनी ज्यादा नहीं थी इसलिए घर में फ्रिज, फोन जैसे उपकरण नहीं थे।
यहां तक कि
उनके क्षेत्र में कई बार सूखा पड़ने की वजह से घर में कई दिनों तक पानी नहीं आता था। सुंदर मां और भाई के साथ पानी के लिए लंबी लाइन में लगते थे। लेकिन कुछ बाल्टी ही पानी मिल पाता था। सुंदर पढ़ाई में अच्छे थे। अपनी पढ़ाई के बूते 1989 में उन्होंने आईआईटी खड़गपुर में इंजीनियरिंग के लिए दाखिला लिया।
उतार-चढ़ावः संसाधनों की कमी को बाधा नहीं बनने दिया
इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद सुंदर को स्टेनफर्ड यूनिवर्सिटी के लिए स्कॉलरशिप मिल गई थी। लेकिन अमेरिका भेजने के टिकट के लिए पिता को सालाना कमाई जितनी राशि खर्च करनी पड़ी थी। अमेरिका काफी महंगा था। घर पर एक मिनट बात करने के लिए सुंदर को 2 डॉलर खर्च करने पड़ते थे। वे इसे अफोर्ड नहीं कर सकते थे। स्टेनफर्ड से मास्टर्स के बाद उन्हें मैकिंजी में काम मिला। 2004 में गूगल से जुड़े।
सफलता: 10 हजार करोड़ रु. नेटवर्थ, पद्म भूषण से सम्मानित
मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले सुंदर 2015 में गूगल के सीईओ बने। वहीं 2019 में उन्हें गूगल की पैरेंट कंपनी अल्फाबेट का भी सीईओ बनाया गया। टाइम मैग्जीन ने उन्हें दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में भी शामिल किया था। भारत सरकार ने उन्हें 2022 में पद्म भूषण से सम्मानित किया था। फोर्ब्स के अनुसार सुंदर की संपत्ति करीब 10 हजार करोड़ रुपए है।
जीवन-सूत्र
दूसरों को गलत कहने की आदत नकारात्मक
बचपन से ही हमारा सोचने का एक तरीका बन जाता है। जैसे कि अपेक्षाएं करना सही है। जबकि जैसे ही ये समझ में आएगा कि हम आत्मा हैं, हमने अनेक जन्म लिए हैं, हमारे संस्कार अलग-अलग हैं, तो फिर एक्सपेक्टेशंस यानी अपेक्षाएं नहीं, बल्कि एक्सेप्टेंस यानी स्वीकार्यता हमारे लिए स्वाभाविक हो जाएगी।
संस्कार मेरे मन पर रिकॉर्डेड होगा, वो ही मुझे सही लगेगा।
जैसे किसी सभागार में इकट्ठे होने का समय सुबह 9:00 बजे का है। तब समय के पाबंद होने की सबकी परिभाषाएं अलग-अलग होंगी। जैसे ईमानदारी की परिभाषा लोगों के लिए अलग-अलग होती है। संजीदगी की अलग, साफ-सफाई की अलग, कार्यदक्षता की अलग। अगर कोई सफाई नहीं रखता और आप बहुत सफाईपसंद हैं तो आप कहेंगे कि ये तो सफाई ही नहीं रखते हैं।
लेकिन कई लोग ऐसे हो सकते हैं,
जो आपसे भी ज्यादा सफाई रखते हों। जो मेरे से कम है, वो भी मुझे अच्छा नहीं लगता और जो मेरे से ज्यादा है, वो भी नहीं। तो सबको कैसे होना चाहिए? बिल्कुल मेरे जैसा होना चाहिए? कोई झूठ बोलता है तो आप कहते हैं बिल्कुल अच्छा नहीं है, झूठ बहुत बोलता है। कोई सच्चा मिल जाए तो कहेंगे जरूरत से ज्यादा सच्चा है, इतना भी सच्चा किसी को नहीं होना चाहिए।
संस्कार यानी शब्द वो ही है,
लेकिन उसकी परिभाषाएं अलग-अलग हैं। अलग होने पर हमने ये नहीं कहा कि उनका संस्कार मुझसे अलग है। हमने कहना शुरू कर दिया कि आप गलत हैं। कि आप लेट आए आप गलत हैं, आपने झूठ बोला आप गलत हैं, आपने ऐसा किया आप गलत हैं।
अब देखना कि जैसे ही यहां से आपने वाइब्स भेजीं कि आप गलत हैं तो आपने डिसरिस्पेक्ट या अपमान की एनर्जी भेजी। मैंने एक थॉट क्रिएट किया कि जो मुझसे अलग है,वो गलत है। तो मुझे बहुत लोग गलत दिखने लगते हैं और कई बार तो पूरी दुनिया ही गलत दिखाई देने लग जाती है।
गलत शब्द डिसरिस्पेक्ट क्रिएट करता है।
रिश्तों की बुनियाद परस्पर सम्मान में ही हो सकती है। डिसरिस्पेक्ट अगर बार-बार बीच में आती गई तो रिश्ता बहुत ही कमजोर नींव पर टिका है। आज एक शब्द को बदलते हैं कि उनका संस्कार मेरे से अलग है। दो लोगों के संस्कार बिल्कुल अलग होकर भी अगर बुनियाद में सम्मान है तो रिश्ता मजबूत होगा। अगर दोनों में से एक भी संस्कार अलग होने पर बुनियाद में अपमान डाल दिया तो रिश्ता कमजोर।
दिन में बच्चों के लिए कितनी बार हम कह देते हैं वो गलत हैं।
और बच्चे कह देते हैं आप गलत। फिर उसको हम कहते हैं- जनरेशन गैप। हर पीढ़ी ने अगली पीढ़ी से यही कहा है आप गलत हैं। अगले ने भी कह दिया कि आप गलत। हमने कहा कि हम आपको नहीं समझ सकते तो उन्होंने भी कहा हम भी आपको नहीं समझ सकते। दुनिया ने कहा कोई बात नहीं, ये सबके साथ होता है- जनरेशन गैप।
आज से सिर्फ एक शब्द को चेंज करना उनके संस्कार हमसे अलग हैं। लेकिन वो संस्कार इस समय उनके लिए सही हैं। पूरी दुनिया भी कहे कि वो संस्कार गलत है लेकिन जिसका वो संस्कार होता है उसको वो ही ठीक ही लगता है। जब तक उसको खुद को नहीं लगेगा, वो अपने संस्कार को चेंज करने वाले नहीं हैं।
लेख का सारांश:
यह लेख एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक और सामाजिक व्यवहार को दर्शाता है — दूसरों को बार-बार गलत ठहराने की आदत। बीके शिवानी इस प्रवृत्ति को नकारात्मक सोच और आत्मिक दुर्बलता का प्रतीक मानती हैं।
मुख्य बिंदु:
- बचपन से मिलने वाली समझ:
हर किसी की परवरिश और सीखने की प्रक्रिया अलग होती है। जो चीज हमें “सही” लगती है, जरूरी नहीं कि वह सबके लिए सही हो। यह विविधता स्वीकार करनी चाहिए। - समझ का स्तर भिन्न होता है:
कोई व्यक्ति अगर सफाई पसंद नहीं है, या समय का पाबंद नहीं है, तो उसे गलत कहना उस व्यक्ति की समझ का अपमान है। हो सकता है उसकी प्राथमिकताएं या शिक्षा अलग हो। - दूसरों की दृष्टिकोण को सम्मान देना:
बार-बार किसी को गलत कहने से रिश्तों में दरार आती है और दूसरों की आत्म-छवि को नुकसान पहुँचता है। - संसार विविधताओं से भरा है:
अगर हर कोई एक जैसा होता, तो यह संसार विविधता से खाली हो जाता। इसलिए दूसरों की अलग सोच को सहर्ष स्वीकार करें। - रिश्तों की नींव:
एक रिश्ता तभी मजबूत रह सकता है जब उसमें समझ, सहनशीलता और स्वीकार्यता हो। दोष निकालना नहीं, सहयोग करना ज़रूरी है। - आत्मनिरीक्षण ज़रूरी है:
जब भी हम किसी को गलत कहते हैं, तो यह हमारे स्वयं के नकारात्मक संस्कारों का प्रतीक हो सकता है।
लेख का निष्कर्ष:
“बार-बार दूसरों को गलत कहना, उनके आत्म-सम्मान को तोड़ता है और रिश्तों की नींव को कमजोर करता है। अगर आप खुद को बेहतर बनाना चाहते हैं, तो दूसरों को स्वीकार करना सीखिए, उन्हें बार-बार गलत कहने से बचिए।”
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