खरमास क्या है? खरमास और मलमास में अंतर- खरमास में भुलकर भी न करें ये काम:-भारत की ज्योतिष परंपरा में खरमास एक अत्यंत महत्वपूर्ण अवधि मानी जाती है। इस समय सूर्य देव अपनी राशि बदलते हुए धनु या मीन में प्रवेश करते हैं। जब सूर्य कमज़ोर स्थिति में होता है और उसकी गति प्रभावित मानी जाती है, तब पूरा महीना खरमास कहलाता है। इसे मलमास भी कहा जाता है, लेकिन दोनों में सूक्ष्म अंतर है।
खरमास का उल्लेख पुराणों में भी मिलता है। मान्यता है कि इस अवधि में शुभ कार्यों के फल कम मिलते हैं, इसलिए हिंदू धर्म में इसे अशुभ समय माना गया है।
खर मास : जब खरों ने खींचा सूर्य का रथ
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार सूर्य अपने सात घोड़ों के रथ पर बैठ कर पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा करते हैं। इस परिक्रमा के दौरान सूर्य का रथ एक क्षण के लिए भी नहीं रुकता। निरंतर चलने और सूर्य के तेज से घोड़े प्यास तथा थकान से व्याकुल होने लगे। घोड़ों की यह दयनीय दशा देखकर सूर्य देव उन्हें विश्राम देने के लिए और उनकी प्यास बुझाने के उद्देश्य से रथ रुकवाने का विचार करते हैं। इस कार्य में रुकावट उनकी प्रतिज्ञा थी कि वे अपनी इस अनवरत चलने वाली यात्रा में कभी विश्राम नहीं लेंगे। यह विचार करते हुए सूर्य देव का रथ आगे बढ़ रहा था।
खर मास किसे कहते हैं? खर मास और मल मास में क्या अंतर है?
कुछ आगे बढ़ने पर सूर्य को एक तालाब के पास दो खर (गधे) दिखाई दिए। उनके मन में विचार आया कि जब तक उनके रथ के घोड़े पानी पीकर विश्राम करते हैं, तब तक इन दोनों खरों को रथ में जोतकर की यात्रा जारी रखी जाए।
ऐसा विचार कर सूर्य ने अपने सारथि अरुण को उन दोनों खरों को घोड़ों के स्थान पर जोतने की आज्ञा दी। सूर्य के आदेश पर उनके सारथि ने खरों को रथ में जोत दिया। खर अपनी मंद गति से सूर्य के रथ को लेकर परिक्रमा पथ पर आगे बढ़ गए।
मंद गति से रथ चलने के कारण सूर्य का तेज भी मंद होने लगा।
सूर्य के रथ को खरों द्वारा खींचने के कारण ही इसे ‘खर’ मास (16 दिसंबर से आरंभ) कहा गया है। खर मास वर्ष में दो बार आता है। एक, जब सूर्य धनु राशि में होते हैं। दूसरा, जब सूर्य मीन राशि में आते हैं। इस दौरान सूर्य का पूरा प्रभाव यानी तेज पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध पर नहीं पड़ता। सूर्य की इस कमजोर स्थिति के कारण ही पृथ्वी पर इस दौरान गृह-प्रवेश, नया घर बनाने, नया वाहन खरीदने, मुंडन, विवाह आदि मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं। इस मास में किसी नए कार्य को शुरू नहीं किया जाता।
इस मास में सूर्य और बृहस्पति की अराधना विशेष फलदायी होती है।
गरुड़ पुराण के अनुसार खर मास में प्राण त्यागने पर सद्गति नहीं मिलती, इसलिए महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह ने अपने प्राण खर मास में नहीं त्यागे थे। उन्होंने सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार किया था।
ध्यान देने की बात है कि खर मास और मल मास में अंतर है। सूर्य के धनु और मीन राशि में आने पर खर मास होता है। यह साल में दो बार आता है।
मल मास तीन साल में एक बार आता है।
इसे अधिक मास और पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। असुर रण्यकश्यप को वरदान था कि उसकी मृत्यु बारह मासों में से किसी भी मास में नहीं होगी, इसलिए भगवान विष्णु ने उसके वध के लिए मल मास की रचना की।
मन को बलवान बनाने के लिए क्या किसी विशेष ध्यान की आवश्यकता है? जो कुछ काम करो, वह तुम्हारा नहीं है। ऐसा खयाल अपने समक्ष रखो, तो पर्याप्त है। इस ध्यान के लिए आरंभ में कठिन प्रयत्न आवश्यक है। धीरे-धीरे यह सहज और स्थिर बन जाता है।
अपने मन को बलवान बनाएं
यदि आत्मा का ज्ञान हो जाए, तो मनोनिग्रह करने की बात नहीं रहती। जब मन का नाश हो जाता है, तब आत्मा प्रकाशमान होती है। ज्ञानी का मन चाहे काम करेयानकरे, उसके अंदर केवल आत्मा सतत विद्यमान रहती है। मन, शरीर और जगत आत्मा से भिन्न नहीं है। आत्मा से अलग उनका अस्तित्व ही नहीं हो सकता। वे आत्मा से भिन्न हो ही नहीं सकते। आत्मा का भान होने के बाद इन प्रतिच्छायाओं की चिंता ही क्यों करनी चाहिए? इन प्रतिच्छायाओं का आत्मा पर क्या असर पड़नेवाला है?
आत्मा स्वयं प्रकाशित हृदय
आत्मा स्वयं प्रकाशित हृदय में है। प्रकाश (चैतन्य) हृदय से निकलकर बुद्धि तक पहुंचता है, जो मन का अधिष्ठान है। जगत मन के द्वारा देखा जाता है। आत्मा के प्रतिबिंबित प्रकाश से ही तुम जगत को देखते हो। मन की क्रिया द्वारा जगत दृश्यमान होता है। जब मन आत्मा से प्रकाश पाता है, तब उसे जगत का भान होता है। जब वह उससे यह प्रकाश नहीं पाता, तब उसे जगत का भान भी नहीं होता है।
यदि मन को अंदर की ओर, प्रकाश के उद्गम की ओर मोड़ा जाए, तो बाह्यज्ञान विनष्ट हो जाता है और तब ‘केवल-आत्मा’ हृदय में प्रकाशित होती है।
अपना दीपक स्वयं बनो
चंद्र सूर्य के प्रकाश से जगमगाता है। सूर्य के अस्त होने पर चंद्र के प्रकाश के सहारे वस्तुओं का बोध प्राप्त किया जाता है। जब सूर्य निकल आता है, तब चंद्र की कोई आवश्यकता नहीं रहती, चाहे आकाश में उसकी थाली जैसी आकृति क्यों न बनी रहे। मन और हृदय को इसी प्रकार समझो। मन की उपयोगिता उसके प्रतिबिंबित प्रकाश में है, जो वस्तुओं को देखने के काम में आता है। अंदर की ओर फिराने पर मन स्वयं प्रकाश ज्योति के स्रोत में समा जाता है। तब उसकी स्थिति दिन में रहनेवाले चंद्र की-सी हो जाती है।
अंधकार में प्रकाश के लिए दीप की आवश्यकता रहती है; पर सूर्योदय के बाद उस दीप की आवश्यकता नहीं रहती।
सब वस्तुएं अपने आप दृष्टिगोचर हो जाती हैं और सूर्य को देखने के लिए अतिरिक्त दीप की कोई आवश्यकता नहीं रहती। अपनी आंखें उस स्वयं-प्रकाशित सूर्य की ओर फिराओ, तो वह दिखाई पड़ता है। मनकी भी यही बात है। वस्तुओं को देखने के लिए मन से प्रतिबिंबित प्रकाश की आवश्यकता है।
हृदय को देखने के लिए मन को उसकी ओर मोड़ना पर्याप्त है। तब मन की कोई गणना नहीं रहती, क्योंकि हृदय स्वयं-प्रकाशित है।
सहज और स्थिर बनें
तुम यदि मन को बलवान बनाओ, तो पहली शांति चालू रहेगी। उसका काल प्रमाण चालू अभ्यास द्वारा प्राप्त मन के बल पर निर्भर है। ऐसा सबल मन ही तेज धारा में टिक सकता है। उस स्थिति में काम में लगे रहो या न रहो, धारा प्रवाह में कोई अंतर रुकावट नहीं पड़ती। बाधा डालनेवाला कर्म नहीं है, पर ‘मैं कर्म करता हूं’ यह विचार ही बाधा डालता है।
अब यह प्रश्न हो सकता है कि
मन को बलवान बनाने के लिए क्या किसी विशेष ध्यान की आवश्यकता है? जो कुछ काम करो, वह तुम्हारा नहीं है। ऐसा खयाल अपने समक्ष रखो, तो पर्याप्त है। इस ध्यान के लिए आरंभ में कठिन प्रयत्न आवश्यक है। धीरे धीरे यह सहज और स्थिर बन जाता है। काम अपने आप चलता रहेगा और तुम्हारी शांति निश्चल टिकी रहेगी।
मनुष्य का सहज स्वभाव ध्यान
ध्यान तुम्हारा सच्चा स्वभाव है। अब तुम उसको ‘ध्यान’ यह विशिष्ट नाम देते हो, क्योंकि तुम्हें विचलित करनेवाले कई तरह के विचार सता रहे हैं। जब इन विचारों को हटा दिया जाएगा, तब तुम अकेले बाकी रह जाओगे अर्थात विचारमुक्त ध्यानावस्था में रहोगे। यही तुम्हारा सच्चा स्वभाव है। दूसरे उन सतानेवाले विचारों से मुक्त होकर तुम इसी स्वाभाविक स्थिति में पहुंचने का प्रयत्न करते हो। उन विचारों को दूर करने को क्रिया को ‘ध्यान’ कहते हैं।
जब यह अभ्यास पक्का हो जाता है,
तब सच्चा स्वभाव सच्चे ध्यान के रूप में व्यक्त होता है। अक्सर ध्यान में लगने पर अन्य विचार बड़े जोर के साथ सताने लगते हैं। ध्यान में सब तरह के विचार उठा करते हैं। यह ठीक हैं। तुम्हारे अंदर जो कुछ विचार छिपे हुए हैं, उन्हें बाहर निकलना ही है। यदि वे नहीं निकलेंगे, तो फिर उनका नाश कैसे होगा ? विचार अपने आप उठा करते हैं। वे यथाक्रम विनष्ट होने के लिए ही उठते हैं। इस प्रकार विचारों के नाश होने पर मन बलवान हो जाता है।
शांति और चेतना साथ-साथ
जीवन में ऐसे भी अवसर आते हैं, जबकि मनुष्य या वस्तु का एक धुंधला-सा पारदर्शक-सा रूप सामने आ जाता है, जैसे कि स्वप्न में। हम ऐसे रूप को बाह्य वस्तु नहीं मानते। फिर भी मन में उसके अस्तित्व का निष्क्रिय भान रहता है। तो भी इस अवस्था में किसी प्रकार का कोई सक्रिय भान नहीं होता। मन में एक गंभीर शांति रहती है। क्या यह वही समय है, जबकि हमें आत्मा में डुबकी लगानी चाहिए या यह किसी मोहिनी विद्या- हिप्नोटिज्म का परिणाम है? तात्कालिक शांति के विचार से क्या इस दशा को उत्तेजन देना उचित है?
मन में शांति के साथ-साथ एक चेतनता रहती है। इसी स्थिति की प्राप्ति हमारा लक्ष्य है। वही आत्मा है। इस बात को न पहचान कर इस विषय में प्रश्न पूछना यही सिद्ध करता है कि वह दशा स्थिर नहीं, क्षणिक है।
जब बहिर्मुख प्रवृत्तियां रहती हैं, तब ‘डुबकी’ मारना शब्द का उपयोग यथार्थ माना जा सकता है।
तब मन को वैसा करने के लिए अंदर की ओर चलाना पड़ता है, जिससे वह बाह्य वस्तुओं की सतह के नीचे डूब जाए। चैतन्य में बाधा पहुंचाए बिना यदि शांति बनी रहे, तो फिर डुबकी की क्या आवश्यकता है? यदि इस दशा को आत्मा समझकर प्राप्त न किया जाए, तो वैसे प्रयास को डुबकी मारने की क्रिया माना जा सकता है। उस अर्थ में कहा जा सकता है कि वह दशा आत्म-साक्षात्कार करने या डुबकी लगाने के उपयुक्त है।
निष्कर्ष
खरमास एक ऐसा समय है जिसमें बड़े कामों से बचकर आध्यात्मिक साधना, दान-पुण्य और मन के विकास पर ध्यान देना चाहिए।
हालाँकि मलमास और खरमास एक जैसे लगते हैं, लेकिन दोनों की परंपरा और उद्देश्य अलग हैं।
खरमास हमें यह सिखाता है कि कभी-कभी जीवन में विराम लेकर स्वयं को सुधारना भी आवश्यक होता है।
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