प्रेम अयनि श्री राधिका, करील के कुंजन उपर वालों Class 10th Hindi PDF Notes
Class -10th

प्रेम अयनि श्री राधिका, करील के कुंजन उपर वालों Class 10th Hindi PDF Notes

प्रेम अयनि श्री राधिका, करील के कुंजन उपर वालों :-

हिन्दी-साहित्य का भंडार भरने में जिन मुसलमान कवियों ने योगदान दिया है उनमें रसखान सबसे प्रमुख हैं। ये जन्म से पठान थे। इनका जन्म सन् 1615 में दिल्ली में हुआ। इनका दिल्ली के शासक-वंश से संबंध था । जब इन्होंने देखा कि राजगद्दी के लिए मारकाट हो रही है तो इन्होंने शाही वंश से नाता तोड़ लिया। इनके मन में भक्ति का संचार हुआ और ये वृन्दावन जाकर रहने लगे। वहीं 1685 ई० में इनकी मृत्यु हुई बतायी जाती है।

प्रारम्भ में रसखान बड़े रसिक थे। सौन्दर्य और प्रेम के मतवाले थे । कहते हैं कि ‘सुजान’ नामक किसी स्त्री से बहुत प्रेम करते थे, किन्तु उस स्त्री के विश्वासघात से इनके हृदय को बहुत आघात लगा। वे विरह में उसी का नाम ले-लेकर गाते थे। एक बार कृष्ण-भक्तों के मुख से कृष्ण की रूप-माधुरी के मधुर पद सुनकर इनका हृदय बदल गया। इनकी प्रेम-भावना अलौकिक हो गई और ये भी श्रीकृष्ण के मोहक रूप और दिव्य गुणों का गान करने लगे ।

रसखान की दो रचनाएँ बताई जाती हैं- (1) सुजान रसखान और (2) प्रेम वाटिका । इन दोनों में सौन्दर्य और प्रेम का मोहक वर्णन इन्होंने किया है। प्रेम के अलौकिक रूप का सूक्ष्म चित्रण इनकी कविता में मिलता है। इनकी भाषा सुमधुर व्रजभाषा है जिसमें संगीतात्मक प्रवाहमयता है। इनका एक-एक सवैया रस से ओत-प्रोत है। इसलिए इनका नाम ‘रसखान’ उचित ही है।

रचनात्मक विशेषता एवं भाषा शैली

रचनात्मक विशेषता एवं भाषा शैली-रसखान ने कृष्ण का लीलागान पदों में नहीं, सवैयों में किया है। रसखान सवैया छंद में सिद्ध को थे । जिनमें सरस, सहज, प्रवाहमय सवैये रसखान के हैं। उतने शायद ही एवं किसी अन्य हिन्दी कवि के हों । रसखान का कोई सवैया ऐसा नहीं मिलता वाली जो उच्च स्तर का न हो । उनके सवैयों की मार्मिकता का आधार दृश्यों देखने और बाह्यांतर स्थितियों की योजना में है।

वही रसखान के सवैयों के ध्वनि प्रेमी प्रवाह भी अपूर्व माधुरी में है। ब्रजभाषा का ऐसा सहज प्रवाह अन्यत्र दुर्लभ है। रसखान सुफियों का हृदय ले कर कृष्ण की लीला पर काव्य कृष्ण रचते हैं। उनमें उल्लास, मादकता, उत्कटता तीनों का संयोग है। इनकी रचनाओं में मुग्ध होकर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कहा था-“इन मुसलमान हरिजन पै। कोटिन हिन्दु बारियो ।”

कविता-परिचय

कविता-परिचय– प्रस्तुत पाठ में रसखान के दो पद संकलित है। प्रथम पद दोहे और सोरठा छंद में है जिसमें राधा एवं कृष्ण के प्रेममय युगल रूप का अति हृदयहारी वर्णन है। इसमें राधा-कृष्ण के मनोहर रूप पर कवि के रसिक हृदय की रीझ व्यक्त हुई है तो सवैया छंद में रचित दूसरे पद में कृष्ण तथा ब्रज के प्रति कवि हार्दिक उद्‌गार प्रकट करता है कि वह हर स्थिति में ब्रज में जीना चाहता है। इसमें ब्रज के प्रति कवि का भावपूर्ण समर्पण व्यक्त है।

हिन्दी साहित्य में कुछ ऐसे मुस्लिम कवि हुए हैं जिन्होंने हिन्दी के उत्थान में अपूर्व योगदान दिये हैं और उन कवियों में रसखान का नाम भी आदर के साथ लिया जाता है। रसखान सवैया, छंद के प्रसिद्ध कवि थे। जितने सरस, सहज, प्रवाहमय सवैये रसखान के हैं, उतने शायद ही किसी अन्य हिन्दी कवि के हों। उनक सवैयों की मार्मिकता का आधार दृश्यों और बाह्यांतर स्थितियों की योजना में हैं। रसखान ने सूफियों का हृदय लेकर कृष्ण की लीला पर काव्य रचना की है। उनमें उल्लास, मादकता और उत्कटता का मणिकांचन संयोग है ।

प्रस्तुत दोहे और सवैया में कवि ने कृष्ण के प्रति अटूट निष्ठा को व्यक्त किया है। राधा-कृष्ण के प्रेममय युगलरूप पर कवि के रसिक हृदय की भावना व्यक्त होती है। पहले पद में कवि ने प्रेमरूपी वाटिका में प्रेमी और प्रेमिका का मिलन और उसके अंतर्मन में उठनेवचाले भावों सजीवा चित्रण किया है। माली ओर मालिन का रूपक देकर कृष्ण राधा के मिलाप को तारतम्य बना दिया है। प्रेम का खजाना संजोने राधा श्रीकृष्ण के रूपों पर वशीभूत है। एक बार मोहन का रूप के बाद अन्य रूप की आसक्ति नहीं होती है। प्रेमिका चाहकर भी से अलग नहीं हो सकती है।

दूसरे पद में

दूसरे पद में-रसखान पुष्टि र्मा में दीक्षित कृष्ण-भक्त कवि हैं। पर वे फिदा हैं। कृष्ण के साथ-साथ उनकी एक-एक वस्तु कवि को सर्वाधिक प्यारी है। वे केवल कृष्ण ही नहीं उनकी हर वस्तु की महिमा और उससे जुड़ी अपनी आकांक्षा का वर्णन करते हुए नहीं थकते । वे प्रस्तुत सबैये में अपनी ऐसी ही आकांक्षाएँ व्यक्त करते हुए कहते हैं, मुझे अगर कृष्ण की लकुटी और कंबली मिल जाए तो तीनों लोक उन न्योछावर कर दूँ।

अगर केवल नंद बाबा की वे गौएँ चराने को मिल जाएँ जिन्हें कृष्ण चराते थे तो आठों सिद्धियाँ और नौ निधियों के सुख को भी भूल जाऊँ। को उनके लिए और तो और अगर इन आँखों से कृष्ण के लीला-केन्द्र ब्रजभूमि के बनबाग और तालाबों देखने को मिल जाएँ तो सैकड़ों इन्द्रलोक उन पर कुर्बान कर दूँ

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