बैटरी वाला स्कूटर – इन दिनों इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा रही है। दोपहिया सेगमेंट में मोटरसाइकिलों पर इलेक्ट्रिक स्कूटर भारी पड़ रहे हैं। इलेक्ट्रिक स्कूटर में बैटरी और रेंज क्षमता बढ़ने के साथ ही खरीदार पेट्रोल स्कूटरों की बजाय ई-स्कूटर खरीदने की ओर रुझान ज्यादा दिखा रहे हैं। हालांकि, जो सवाल भारत में ईवी बूम की शुरुआत में बेहद प्रासंगिक था, वह आज भी कायम है कि इलेक्ट्रिक स्कूटर खरीदना कितना व्यावहारिक है? आइए जानें कैसे बदल रही है ई-स्कूटर की दुनिया…
बैटरी क्षमता में बेहतर हुए ई-स्कूटर
भारत में इलेक्ट्रिक स्कूटर सेगमेंट तेजी से बदल रहा है। वाहन निर्माता कंपनियां अबई-स्कूटर की बैटरी क्षमता बढ़ाने और परफॉर्मिस बेहतर करने पर लगातार काम आ गए कर रही हैं। कई ऐसे ई-स्कूटर आ गए है, जिनकी बैटरी रेंजदे रहे हैं। यही वजह है कि खरीदार इंटरनल कंबस्शन इंजन के स्कूटर की तुलना में ई-स्कूटर की ओर ज्यादा रुख कर रहे हैं। बीते खलई-स्कूटरों की बिक्री 10 लाख का आंकड़ा पार कर गई। आइए जानते हैं कि किन हालात में ई-स्कूटर एक फायदेमंद सवारी सांचित होगाः
50 किमी की रेंज तक उपयोग
अगर आपकी रोजाना की यात्रा शहर के भीतर और लगभग 50 किमी तक सीमित है, तो इलेक्ट्रिक स्कूटर एक अच्छा विकल्प है। ज्यादातर हाईवे पर राइडिंग और 50 किमी से अधिक दूरी के लिए यह फायदेमंद नहीं होगा, क्योंकि सार्वजनिक चार्जिंग सुविधाएं बेहद सीमित हैं। हालांकि, इस साल 5 केडब्लूएच से अधिक बैटरी क्षमता वाले नए स्कूटर आने वाले हैं, जो कभी-कभार हाईवे राइड के लिए बेहतर साबित हो सकते हैं।
उपयोग पर कम खर्च
बिजली पेट्रोल की तुलना में सस्ती पड़ती है और लंबी अवधि में खर्च में बचत भी होती है। इसका मतलब है कि इलेक्ट्रिक स्कूटर चलाने का खर्च पेट्रोल स्कूटर की तुलना में काफी कम होता है।
सरकारी सब्सिडी की सुविधा
कुछ राज्यों में इलेक्ट्रिक स्कूटर सरकारी प्रोत्साहन स्कीम के साथ उपलब्ध हैं, जिससे शुरुआती लागत भी कम हो जाती है। इलेक्ट्रिक स्कूटरों को ‘फेम’ योजना का लाभ भी मिलता है। ध्यान रखें कि ये सब्सिडी सिर्फ हाई-स्पीड इलेक्ट्रिक स्कूटर पर ही लागू होती है और इसकी एक तय सीमा भी होती है।
कुछ चुनौतियां भी
- भारत में सार्वजनिक ईवी चार्जिंग सुविधा हर जगह समान रूप से उपलब्ध नहीं है। चार्जिंग स्टेशन की मौजूदगी बड़े शहरों के आसपास ही सीमित है।
- एक ई-स्कूटर को पूरी तरह चार्ज होने में आमतौर पर कई घंटे लगते हैं। हालांकि, कुछ मॉडल फास्ट चार्जिंग के साथ आ रहे हैं, तो 20-30 मिनट में करीब 50 किमी की रेज तक की चार्जिन दे रहे हैं। ओला एस वन प्री का हाइपरचार्जिंग नेटवर्क या एथर ग्रिड फास्ट चार्जिंग नेटवर्क पर आधे घंटे में चार्जिंग संभव है, लेकिन इनकी उपलब्धता सीमित है। कई ई-स्कूटर 0-80% चार्ज करीब 40-50 मिनट में कर लेते हैं, वहीं, सीरी बिडा बीएक्स-2 जैसे मॉडल में स्वैपेचल बैटरी का विकल्प मिलता है।
- ई-वाहन को संभालने में सक्षम मैकेनिक या सर्विस सेंटर ढूंढ़ना कभी-कभी मुश्किल काम हो जाता है।
- 35 फीसदी से ज्यादा ही सकती है ई-स्कूटरों की हिस्सेदारी 2030 तक, कुल स्कूटरों की बिक्री में। यानी हर 3 का 4 स्कूटरों में से लगभग । स्कूटर इलेक्ट्रिक होगा। इस आधार पर माना जा रहा है कि 55,000-70,000 रुपये के किफायती ई-स्कूटर विकास की अगली लहर को गति देंगे।
बैटरी बदलवाना और रीसेल मूल्य
बैटरियों की उम्र सीमित होती है। आईसीई तकनीक पिछले 100 वर्षों से विकसित हो रही है, जबकि बैटरी तकनीक अभी अपेक्षाकृत नई है। इसी वजह से बैटरी तकनीक अभी भी आईसीई वाहनी की तुलना में कम भरोसेमंद मानी जाती है। बैटरी की सीमित उम्र उपभोक्ताओं पर मानसिक दबाव भी डालती है। बैटरी को बदलना काफी महंगा हो सकता है। इस्तेमाल किए गए इलेक्ट्रिक स्कूटर की रीसेल वैल्यू भी पेट्रोल स्कूटर की तुलना में काफी कम होती है।
आप 2026 में एक नया ई-स्कूटर खरीदने की योजना बना रहे हैं, तो आईडीसी आंकड़ों के अनुसार सबसे ज्यादा रेंज देने वाले इन पांच विकल्पों को आजमा सकते हैं।
ओला एस 1 प्रो
भारत में उपलब्ध सभी इलेक्ट्रिक स्कूटरों में सबसे ज्यादा रेंज का दावा करता है। यह रेंज केवल 5.2 कैडब्लूएच बैटरी बैंक वाले वेरिएंट्स में मिलती है, जिनमें एसः प्री स्पोट्र्स (रेंज 320 किमी) और एसा प्रो शामिल है। एक्स-शोरूम कीमत क्रमशः 1,49,999 और 1,54,999 है।
सिंपल वन जेन 2
यह कंपनी का नवीनतम मॉडल है। दावा की गई रेंज 265 किमी है। यह रेंज टॉप वेरिएंट में मिलती है, जिसमें 5.0 केडब्ल्यूएच बैटरी पैक दिया गया है। इसकी एक्स-शोरूम कीमत 1,77,999 रुपये है।
रिवर इंडी जेन 3
आईडीसी-प्रमाणित रंज 163 किमी है। यह ई-स्कूटर 4 केडब्लूएच बैटरी पैक के साथ आता है। इसकी एक्स शोरूम कीमत 1.46.399 रुपये है और यह केवल एक ही वेरिएंट में उपलब्ध है।
टीवीएस आईक्यूब
इसके एसटी वेरिएंट में 212 किमी की आईडीसी प्रमाणित रंज मिलती है। जिसमें 5.3 केडब्लूएच बैटरी दी गई है। इसकी एक्स-शोरूम कीमत 1.58.834 रुपये है।
विडावी 2
इसकी आईडीसी -प्रमाणित सिंगल-चार्ज रेंज 165 किमी है। यह वी2 प्री वेरिएंट में उपलब्ध है, जिसकी एक्स-शोरूम कीमत 1,20,300 रुपये है।
ड्राइविंग की समझ बनाएगी जिम्मेदार
वाहनों की बढ़ती संख्या के साथ ही सड़क पर जोखिम भी तेजी से बढ़ा है। ऐसे में सड़क सुरक्षा अब लाइसेंस तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह इस बात पर निर्भर करती है कि ड्राइविंग कैसे और किस तरह सीखी गई है। यही कारण है कि ड्राइविंग स्कूलों की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा महसूस की जा रही है
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल लाखों सड़क दुर्घटनाएं दर्ज होती हैं, जिनमें कई मामलों में ड्राइवर के पास वैध लाइसेंस होता है, फिर भी हादसों का होना यह बताता है कि गाड़ी चलाने का उचित प्रशिक्षण और मार्गदर्शन कितना जरूरी हो गया है।
डॉ. सियाराम वर्मा (आरटीओ),
गाजियाबाद डिविजन के अनुसार सही ड्राइविंग स्कूल चुनना बेहद जरूरी है। केवल बोर्ड या विज्ञापन भरोसे का प्रमाण नहीं होते। यह जरूर देखना चाहिए कि स्कूल परिवहन विभाग से पंजीकृत है, प्रशिक्षक के पास वैध लाइसेंस और अनुभव है और गाड़ी पूरी तरह सुरक्षित है। अधिकृत स्कूल शॉर्टकट का वादा नहीं करते। सही प्रक्रिया में पहले लर्नर लाइसेंस, फिर तय ट्रेनिंग और अंत में ड्राइविंग टेस्ट होता है। स्कूल का असली मकसद सिर्फ लाइसेंस देना नहीं, बल्कि सुरक्षित और जिम्मेदार ड्राइवर तैयार करना है।
क्यों जरूरी बन रहे ड्राइविंग स्कूल
ड्राइविंग स्कूल में चालकों को ट्रैफिक नियमों की बुनियादी समझ, सड़क पर सही समय पर सही फैसला लेना और जिम्मेदार बनना सिखाया जाता है। तय ट्रेनिंग और भीड़भाड़ वाली सड़कों पर कराया गया अभ्यास ड्राइवरों को बदलते ट्रैफिक हालात के लिए तैयार करता है और सड़क दुर्घटनाओं को कम करने में मदद करता है।
ऐसे दी जाती है ट्रेनिंग
शुरुआत क्लासरूम से होती है, जहां आसान भाषा में गाड़ी के हिस्सों का इस्तेमाल करना, ट्रैफिक संकेत और जरूरी एवं बुनियादी नियम समझाए जाते हैं। इसके बाद खाली मैदान में अभ्यास कराया जाता है। कई स्कूलों में सिम्युलेटर की मदद से मोड़ लेने, ब्रेक लगाने और अचानक बने हालात में सही प्रतिक्रिया देना सिखाया जाता है। सहज होने पर ही सीखने वाले को हल्के ट्रैफिक वाली सड़कों पर ले जाकर गियर बदलना, इंडिकेटर देना और लेन बदलना सिखाया जाता है।
तय समय सीमा
आमतौर पर ड्राइविंग सीखने का कोर्स 15 से 30 दिन तक का होता है। नए ड्राइवर के लिए अमूमन 20-30 दिन का कोर्स उपयुक्त होगा। वहीं थोड़ा बहुत जानकारी रखने वालों के लिए 10-15 दिन का कोर्स भी होता है। हर दिन करीब आधा घंटा से एक घंटा अभ्यास कराया जाता है।
फीस कितनी
शहर और स्कूल के हिसाब से अलग होती है। अकसर 15 दिन का कोर्स 3-5 हजार रुपये, 20-25 दिन का 5-7 हजार और 30 दिन का पूरा कोर्स 7-10 हजार रुपये में कराया जाता है। ड्राइविंग स्कूल लर्नर लाइसेंस बनवाना या ड्राइविंग टेस्ट बुकिंग जैसी सुविधाएं देता है, तो इसके लिए अतिरिक्त शुल्क लिया जा सकता है। पूरी जानकारी लेकर ही ड्राइविंग स्कूल चुनें।
यह भी जानें
- अधिकृत स्कूल की सूची Parivahan Sewa वेबसाइट पर देखें।
- राज्य परिवहन विभाग की वेबसाइट पर शहर के पंजीकृत ड्राइविंग स्कूल की जानकारी मिल सकती है।
- प्रशिक्षक के वैध ड्राइविंग लाइसेंस और अनुभव की जांच करें।
- स्कूल की गाड़ी सुरक्षित और बीमा वाली होनी चाहिए।
- कई राज्यों में लर्नर लाइसेंस की आवेदन प्रक्रिया और ड्राइविंग टेस्ट की बुकिंग ऑनलाइन होती है।
- फीस की रसीद जरूर लें। किसी भी ‘बिना टेस्ट लाइसेंस दिलाने’ वाले वादे से सावधान रहें।
- किसी समस्या या अधूरी ट्रेनिंग की स्थिति में आरटीओ या राज्य परिवहन विभाग में शिकायत करें।
- परिवहन विभाग से संबंधित जानकारी के लिए चैटबॉक्स पर नंबर 8005441222 उपलब्ध है।
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